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	<title>indian story Archives - Youngisthan.in</title>
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		<title>चंचल मन की शरारतों को संत भी ना रोक सके.</title>
		<link>https://www.youngisthan.in/hindi/how-to-control-your-mind-16182/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Sagar Shri Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 07 Nov 2015 09:58:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[human beings]]></category>
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					<description><![CDATA[<p><img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/sant-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="sant" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" fetchpriority="high" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/sant-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/sant-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/sant.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />“मन के हारे हर है, मन के जीते जीत” यह कहावत इसलिए कही गयी है क्यों कि यदि व्यक्ति मन से सुदृढ़ नहीं है तो वह चाहे किसी भी उम्र में हो या कितना ही बड़ा संत &#8211; सन्यासी क्यों न हो, मन से हार ही जाता है. मन की चंचलता, मन की शरारतें हर [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/sant-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="sant" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/sant-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/sant-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/sant.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p>“मन के हारे हर है, मन के जीते जीत”</p>
<p>यह कहावत इसलिए कही गयी है क्यों कि यदि व्यक्ति मन से सुदृढ़ नहीं है तो वह चाहे किसी भी उम्र में हो या कितना ही बड़ा संत &#8211; सन्यासी क्यों न हो, मन से हार ही जाता है.</p>
<p>मन की चंचलता, मन की शरारतें हर व्यक्ति को उसके आगे मजबूर कर देती है. मन की ख्वाहिशों पर नियंत्रण रखना आसन नही होता, लेकिन यही वह परीक्षा का समय होता है जब मन के घोड़े पर लगाम लगाने की स्थिति उत्पन्न होती है. आज ऐसा ही एक किस्सा हम आप के साथ बांटेंगे, जिसे पढ़ कर हम सब की ज़िन्दगी में मन की चंचलता पर लगाम लगाने की सीख मिलेगी.</p>
<p>पुराने किसी समय में एक संत हुआ करते थे, जो अपने संयम के लिए जाने जाते थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन एक  सन्यासी की तरह जिया और उनकी इसी दृढसंकल्प के चलते सभी लोग उन्हें बहुत सम्मान के भाव से देखते थे. अपनी कठिन तपस्या में उन्होंने ने अन्न का त्याग तो पहले ही कर दिया था लेकिन उन्हें दूध बहुत प्रिय था. उन्होंने एक बार ऐसे ही विचार किया कि जब उन्होंने ने जीवन के सभी भोगों पर नियंत्रण कर लिया है तो फिर दूध के लगाव पर क्यों  नहीं? इस बारे में सोचते सोचते उन संत ने तय किया कि अब से वह दूध का भी त्याग कर देंगे.</p>
<p>जब यह बात सभी लोगों को ज्ञात हुई तो हर किसी को आश्चर्य हुआ, लेकिन ऐसा करते हुए कई साल बीत गए उन्होंने दूध का सेवन नहीं किया. लेकिन एक दिन उन्हें यूँ ही ख्याल आया कि आज दूध पिया जाये और एक ख्याल के आते उनकी यही भावना हर रोज़ प्रबल होती गयी. अंततः उन्होंने एक धनी व्यक्ति के यहाँ भोज पर जाने के दौरान दूध पीने की इक्छा जताई.</p>
<p>सेठ संत की यह बात सुनकर दंग रह गया क्योकि उसे यह पता था कि संत ने दूध न पीने का संकल्प लिया है. लेकिन संत की बात के मानते हुए उसने शाम को संत की कुटिया के बाहर दूध से भरे 40 घड़े सामने रखवा दिया. संत वहां  पहुचते ही इतने दूध देखे तो सेठ से सवाल किया कि दूध तो मुझ अकेले को ही पीना है फिर आपने यह 40 घड़े क्यों रखवा दिए है?</p>
<p>सेठ ने कुछ देर सोच कर संत की बातों का जवाब दिया कि महाराज आपने 40 साल पहले दूध पीना छोड़ा था और उस हिसाब से यह 40 घड़े आप के लिए पार्यप्त रहेंगे.</p>
<p>संत सेठ की बात सुन कर समझ गए कि वह क्या कहना चाहता हैं और उन्हें अपनी भूल का एहसास होने लगा.</p>
<p>संत ने कहा कि इस सबक के बाद मुझे मन के टूटते नियंत्रण पर लगाम पा लिया है.</p>
<p>मनुष्य का मन किसी बच्चे की तरह होता है.</p>
<p>उसे खुद की अगली गति ज्ञात नहीं होती है. वह हर बार उछल-कूद करता है लेकिन उस पर नियंत्रण रखना भी हमारा ही कार्य है और यह नियंत्रण तपस्या और अभ्यास से आता है.</p>
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		<title>एक विदुषी स्त्री ने एक मुर्ख पुरुष को कवि कालीदास कैसे बनाया?</title>
		<link>https://www.youngisthan.in/hindi/how-a-wise-woman-made-a-fool-man-kavi-kalidas-16141/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Sagar Shri Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Nov 2015 09:18:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[hindu]]></category>
		<category><![CDATA[Hindu Culture]]></category>
		<category><![CDATA[indian story]]></category>
		<category><![CDATA[kalidaas]]></category>
		<category><![CDATA[literature]]></category>
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					<description><![CDATA[<p><img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/kavi-kalidas-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="kavi-kalidas" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/kavi-kalidas-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/kavi-kalidas-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/kavi-kalidas.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />साहित्य जगत के महान कवियों में से एक कवि कालीदास के बारे में हम सब ने सुना है. कवि कालीदास ने अपने जीवनकाल में कई बेहतरीन काव्य रचनायें की है, लेकिन उनके द्वारा लिखे हुए साहित्यों में से शकुंतला और मेघदूत ये दो किताबों ने उन्हें महान कवियों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया. [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/kavi-kalidas-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="kavi-kalidas" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/kavi-kalidas-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/kavi-kalidas-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/11/kavi-kalidas.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p>साहित्य जगत के महान कवियों में से एक कवि कालीदास के बारे में हम सब ने सुना है.</p>
<p>कवि कालीदास ने अपने जीवनकाल में कई बेहतरीन काव्य रचनायें की है, लेकिन उनके द्वारा लिखे हुए साहित्यों में से शकुंतला और मेघदूत ये दो किताबों ने उन्हें महान कवियों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया. साथ ही इन किताबें के अलावा आज तक लोगों को उनकी लिखी कई रचनाएं अपनी और आकर्षित करती रही है.</p>
<p>लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक महामुर्ख व्यक्ति एक महाज्ञानी और एक कल्पनाशील कवि कालीदास कैसे बना?</p>
<p>आईएं आज हम आपको कवि कालिदास और उनकी पत्नी विद्योत्मा की रोचक कहानी बताते है.</p>
<p>विद्योत्मा बहुत पहले एक राजकुमारी थी.</p>
<p>यह राजकुमारी बहुत विद्वान थी. वह तर्क-वितर्क में अच्छे अच्छों को परास्त कर देती थी. जब उसकी शादी कि बात चली तब उसने घोषणा कर दी कि वह सिर्फ और सिर्फ उसी इंसान से शादी करेगी जो उसे ज्ञान चर्चा में हरा सके. उसके राज्य के विद्वान राजकुमारी से परास्त होकर वैसे ही कुंठित बैठे थे. उन विद्द्वनों के अहंकार को चोट लगी थी और वे अपना बदला लेना चाहते थे.</p>
<p>उन्होंने मिल कर योजना रची कि राजकुमारी का विवाह एक ढोर से कराएँगे तभी उनको चैन मिलेगा. अपनी इसी घृणा के चलते वे सब एक महामूर्ख को ढूंढने निकले तो कुछ दिन बाद उन्हें एक आदमी मिला बड़ा ही विचित्र, जिस पेड़ कि डाल पर बैठा था और उसी को काट रहा था. उन्होंने सोचा इससे बड़ा मूर्ख कहाँ मिलेगा, इन्होने उस आदमी को नीचे बुलाया और उससे कहा- &#8220;चलो हमारे साथ हम तुम्हें महल मैं बढ़िया भोजन करवाएंगे, बस एक ही शर्त है महल मैं जाकर तुम्हें कुछ भी नहीं बोलना है,जो कुछ बताना चाहते हो सिर्फ इशारे से बताना&#8221; वह आदमी राज़ी ख़ुशी उन लोगों के साथ चल पड़ा. विद्वान राजा के सामने उपस्थित हुए और उन्होंने कहा कि हमें राजकुमारी के लायक एक बहुत बड़े विद्वान मिले हैं, उन्हें राजकुमारी का प्रस्ताव स्वीकार है परन्तु उन्होंने चर्चा कि शर्त यह रखी है कि वे अपने मुंह से कुछ नहीं बोलेंगे.</p>
<p>राजकुमारी और वह व्यक्ति आमने सामने बैठे, राजकुमारी ने मुर्ख को अपनी खुली हथेली दिखायी तो मुर्ख को लगा वे उसे थप्पड़ दिखा रही हैं, उसने बदले में एक अपनी बंद हथेली यानी एक घूँसा दिखाया. विद्वानों ने इस विचित्र प्रसंग का यह निष्कर्ष निकल कर प्रस्तुत किया कि राजकुमारी ने खुली हथेली से पाँचों इंद्रियां दिखायी पर विद्वान कि मुट्ठी का मतलब यह है कि इंद्रियों को हमेशा नियंत्रण में रखना चाहिए. राजकुमारी ने यह बात सही मानते हुए अपनी हार स्वीकार कि और उस व्यक्ति से शादी करने को तैयार हो गयी.</p>
<p>शादी के पश्चात जब राजकुमारी को पता चला कि उसके पति एक बड़े विद्वान नहीं एक बड़े मुर्ख हैं तो वो बहुत आहात हुयी और उसने अपने पति को बहुत कोसा. मुर्ख को उसके इस व्यव्हार का काफी दुःख हुआ उसने सोचा वो ज्ञान प्राप्त करके ही रहेगा. उजैन के गढ़ कलिका मंदिर में उसने देवी से प्रार्थना करने लगे कि वह उसे ज्ञान दें, बदले में वह अपनी जीभ तक काटने को तैयार थे. जब उसने अपनी जीभ काटने के लिए तलवार उठायी देवी प्रकट हुयी और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया.</p>
<p>बस इसके बाद उस मुर्ख ने जो किया उसका साक्षी पूरा साहित्य जगत हैं. कवि कालीदास अगर कवि कालिदास बन पाएं तो इसके  पीछे उनकी धर्मपत्नी का सर्वाधिक योगदान था.</p>
<p>शकुंतला और मेघदूत जैसी रचनाएं उन्होंने ने अपनी पत्नी से विरह के दौरान ही लिखी थी जो सबसे लोकप्रिय हुई.</p>
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		<item>
		<title>एक किस्सा आईने का, जो कोई न समझ पाया!</title>
		<link>https://www.youngisthan.in/hindi/the-story-of-a-mirror-that-nobody-understood-15689/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Sagar Shri Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Oct 2015 07:52:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[human beings]]></category>
		<category><![CDATA[indian story]]></category>
		<category><![CDATA[money]]></category>
		<category><![CDATA[story]]></category>
		<category><![CDATA[world behind money]]></category>
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					<description><![CDATA[<p><img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/10/Hindu-Sadhu-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="Hindu-Sadhu" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/10/Hindu-Sadhu-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/10/Hindu-Sadhu-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/10/Hindu-Sadhu.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />हम सब के लिए पैसों की कितनी एहमियत हैं, यह हम सब को अच्छी तरह से ज्ञात हैं. इसलिए हर दिन सुबह से लेकर रात तक पूरी ज़िन्दगी हम पैसे कमाने में निकाल देते हैं, लेकिन इन सब से अलग ताजुब की बात यह हैं कि जिन पैसों के लिए हमने अपनी पूरी ज़िन्दगी खपा [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/10/Hindu-Sadhu-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="Hindu-Sadhu" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/10/Hindu-Sadhu-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/10/Hindu-Sadhu-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/10/Hindu-Sadhu.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p>हम सब के लिए पैसों की कितनी एहमियत हैं, यह हम सब को अच्छी तरह से ज्ञात हैं.</p>
<p>इसलिए हर दिन सुबह से लेकर रात तक पूरी ज़िन्दगी हम पैसे कमाने में निकाल देते हैं, लेकिन इन सब से अलग ताजुब की बात यह हैं कि जिन पैसों के लिए हमने अपनी पूरी ज़िन्दगी खपा दी उसे अपनी मौत के बाद हम यही छोड़ कर चले जाते हैं.</p>
<p>अगर इन बातों को सकारात्मक तरीके से लिया जाये तो यह तकलीफदेह नहीं लगती हैं, लेकिन यदि इसी बात को नकारात्मक तौर पर लिया जाये तो हमारा पूरा का पूरा जीवन व्यर्थ लगता हैं.</p>
<p>हम सुबह क्यों उठे?</p>
<p>क्यों ऑफिस पहुचने की हड़बड़ी में अपना नाश्ता छोड़ कर भागते है?</p>
<p>क्यों 2 मिनिट की देरी के डर से अपनी जान जोखिम में डालकर ट्रेन और बस पकड़ते है?</p>
<p>क्यों अपने ज़मीर को तांक में रखकर वो सारे काम करे जिसके लिए हम तैयार ही नहीं हैं?</p>
<p>सिर्फ इसलिए कि ज़िन्दगी काटने के हम सभी के लिए कुछ पैसे ज़रूरी होती हैं, मगर ये पैसे तो यही रह जाने हैं.</p>
<p>ऐसी बात से जुड़ी एक कहानी आज हम आप को बताते हैं &#8211; एक किस्सा आईने का, जो कोई न समझ पाया!</p>
<p>किसी गाँव में एक साहूकार होता था, जिसे धन सम्पति जोड़ने में बहुत आनंद मिलता था और वह इस काम में काफी योग्य भी था. लेकिन कुछ ही दिन में उसे अपनी योग्यता का अहंकार भी हो गया था. अपने धन सम्पति और गुणों के से हुए घमंड के कारण जब भी कोई ज़रूरतमंद व्यक्ति उसके घर कुछ लेने या भीख मांगने आता तो वह उसे भला बुरा कहकर भगा दिया करता था.</p>
<p>एक रोज़ उसने अपने घर किसी महात्मा को भोजन करने के लिए निमंत्रण दिया और महात्मा के भोजन पूर्ण होने के बाद  लौटते वक़्त एक दर्पण भेंट किया और कहा कि आप को जब भी दुनिया का सबसे मुर्ख व्यक्ति मिले तो आप उसे यह दर्पण भेंट कर दीजियेगा. साहूकार की बात सुनकर महात्मा दर्पण लेकर वहां से चले गए. लेकिन बहुत समय जब घूमते हुए वहीं महात्मा वापस उस साहूकार के घर पहुचे तो देखा कि उस साहूकार की तबियत बहुत ख़राब चल रही हैं और वह मृत्यु सैय्या पर लेटा हुआ हैं.</p>
<p>महात्मा को देख साहूकार टूट गया और कहने लगा कि महाराज कोई ऐसी विद्या बताये जिससे मेरे प्राण बच जायें. साहूकार की बात सुनकर महात्मा ने जवाब दिया कि मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ. ये बात कह कर उन्होंने अपने झोले से एक आईना निकाल कर उसे साहूकार को दिया.</p>
<p>उस दर्पण को देखकर साहूकार को याद आया कि यह दर्पण तो उसने ही महात्मा को भेंट स्वरुप दिया था यह कहकर कि जब दुनिया में आपको कोई मुर्ख व्यक्ति मिले तो उसे दे दीजियेगा. इसके बाद महात्मा ने कहा कि मैंने दुनिया में तुमसे ज्यादा मुर्ख व्यक्ति नहीं देखा इसलिए तुम्हे ही यह दर्पण दे रहा हूँ.</p>
<p>तुमने अपनी पूरी ज़िंदगी धन कमाने में निकाल दी लेकिन आज वही धन तुम्हारे प्राण बचाने में असमर्थ हैं.</p>
<p>महात्मा की इन बातों को सुनकर साहूकार को समझ आ गया कि उससे कहा भूल हुई हैं.</p>
<p>वैसे यह किस्सा हम सब के साथ भी होता हैं कि हम अपना पूरा जीवन एक ऐसी चीज़ के लिए निकाल देते हैं जिसका महत्त्व वस्तु के लेनदेन से अधिक कुछ नहीं हैं.</p>
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		<title>जानियें श्रीकृष्ण का वंश कैसे ख़त्म हुआ?</title>
		<link>https://www.youngisthan.in/hindi/how-lord-krishna-family-destroyed-13506/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Sagar Shri Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2015 04:13:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[dharm]]></category>
		<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[india]]></category>
		<category><![CDATA[indian story]]></category>
		<category><![CDATA[mahabharat]]></category>
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		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदू]]></category>
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					<description><![CDATA[<p><img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/krishna1-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="krishna" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/krishna1-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/krishna1-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/krishna1.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />महाभारत काल में 18 दिन तक चले युद्ध के बाद कौरववंश का पूरी तरह नाश हो गया था और पांडवो के वंश में पाँच भाई के अलावा और कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं बचा था. धृतराष्ट्र और गांधारी अपने सभी पुत्रों की मृत्यु से इतने अधिक व्यथित थे कि उन्होंने श्रीकृष्ण को इस पुरे घटनाक्रम [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/krishna1-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="krishna" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/krishna1-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/krishna1-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/krishna1.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p>महाभारत काल में 18 दिन तक चले युद्ध के बाद कौरववंश का पूरी तरह नाश हो गया था और पांडवो के वंश में पाँच भाई के अलावा और कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं बचा था.</p>
<p>धृतराष्ट्र और गांधारी अपने सभी पुत्रों की मृत्यु से इतने अधिक व्यथित थे कि उन्होंने श्रीकृष्ण को इस पुरे घटनाक्रम का दोषी क़रार दिया था.</p>
<p>महाभारत युद्ध के बाद जब पांडवों में से युधिष्टिर का राज्याभिषेक हो रहा था, तब वहां मेहमानों में धृतराष्ट्र अपनी पत्नी और कौरवों की माँ गांधारी के साथ वहां मौजूद थे. अपने पुत्रो को खो देने के बाद स्वाभाविक था कि माता-पिता के दिल में उनसे बिछड़ने का दुःख रहा होगा, लेकिन जैसे ही इस समाहरों में श्रीकृष्ण भी पहुचे कौरवो की माँ गांधारी अपने क्रोध पर नियंत्रण नही रख पाई और भगवान् कृष्ण को देखते ही यह श्राप दे डाला कि जिस तरह भाइयों के बीच युद्ध करा के आपने मेरे पुत्रों को मृत्यु तक पहुचाया हैं उसी तरह आप के कूल का भी नाश होगा.</p>
<p>युधिष्टिर के राज्याभिषेक के वक़्त श्रीकृष्ण को मिले श्राप से कान्हा तुरंत द्वारिका लौट आये और आते ही सभी यदुवंशियों को यह आदेश दिया कि हम अभी प्रयाग की ओर प्रस्थान करेंगे. आप सभी लोग अपने साथ अपनी जिंदगी से जुड़ी आवश्यक वस्तु साथ ले चलियें.</p>
<p>संकटकाल से बचकर प्रयाग पहचे सभी यदुवंशी जब यहाँ रुक कर विश्राम कर रहे थे तभी श्रीकृष्ण के सारथी सात्यिकी और कृतवर्मा के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया और सात्यिकी ने क्रोध में आकर कृतवर्मा का सर काट डाला.</p>
<p>सात्यिकी और कृतवर्मा के बीच हुए इस युद्ध ने इतना बड़ा रूप ले किया की पूरी यदुवंश में गृहयुद्ध छिड़ गया और सभी यदुवंशी एक दुसरे को मृत्यु के घाट उतारनें लगे. इस युद्ध का परिणाम यह हुआ कि श्रीकृष्ण अपने पुत्र प्रध्युम और उनके सारथी सात्यिकी समेत पूरा का पूरा यदुवंश ख़त्म हो गया और बलराम के साथ श्रीकृष्ण बेबस होकर इस पूरी घटना को देखते रहे.</p>
<p>अपने कूल का नाश देखकर बलराम समुद्र में शेषनाग के अवतार में वापस जाकर अपनी देह त्याग कर दिया और श्रीकृष्ण वन में जाकर ध्यान में लीन हो गए. भगवान् के ध्यान के समय ही उस वन में एक भील ने हिरन के भ्रम में श्रीकृष्ण के तलवे पर विषबुझा तीर मार दिया लेकिन जैसे उसने हिरन की जगह श्रीकृष्ण को पाया तो ग्लानी भाव से क्षमायाचना करने लगा. भगवान् श्रीकृष्ण ने मुस्कुरा कर बहेलिये से कहा कि तुमने मेरे मन का कार्य किया हैं और इसके लिए तुम स्वर्ग को प्राप्त करोगे. तभी अपने सारथी दारुक के हाथों श्रीकृष्ण ने द्वारिका सन्देश भिजवाया कि यदुवंश का नाश हो चूका हैं और सभी यदुवंशियो से कह दो की द्वारिका नगरी छोड़ कर कही और प्रस्थान करे क्योकि द्वारिका जलमग्न होने वाली हैं.</p>
<p>कहा जाता हैं कि त्रेता युग में जिस तरह श्रीराम ने बाली का छुप कर वध किया था वैसी ही मृत्यु द्वापरयुग में उन्होंने  अपने लिए तय किया था.</p>
<p>&#8230;और इस तरह श्रीकृष्ण का वंश खत्म हुआ.</p>
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		    <thumbimage>https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/krishna1-150x150.jpg</thumbimage>
    	</item>
		<item>
		<title>महाभारत में युद्ध के बाद अवैधसंबंध से जन्मा एक मात्र कौरव जीवित बचा था !</title>
		<link>https://www.youngisthan.in/hindi/vikarn-the-only-kaurav-was-alive-after-mahabharat-yuddh-13162/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Sagar Shri Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Sep 2015 06:51:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[hindu]]></category>
		<category><![CDATA[indian story]]></category>
		<category><![CDATA[mahabharat]]></category>
		<category><![CDATA[इंडिया]]></category>
		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[विकर्ण]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदू]]></category>
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					<description><![CDATA[<p><img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/kaurav-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="kaurav" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/kaurav-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/kaurav-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/kaurav.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />महाभारत काल में कौरव-पांडव युद्ध के पहले से ही धृतराष्ट्र और पांडू के बीच सिहांसन के लिए शीतयुद्ध चलता रहता था. दोनों भाइयों की यही ख्वाहिश थी कि उनका पुत्र ही हस्तिनापुर का उतराधिकारी बने लेकिन सिहांसन पर बैठने की यह शर्त इस बात पर निर्भर करती थी कि दोनों राजाओं में से जिसका भी [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/kaurav-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="kaurav" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/kaurav-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/kaurav-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/kaurav.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p>महाभारत काल में कौरव-पांडव युद्ध के पहले से ही धृतराष्ट्र और पांडू के बीच सिहांसन के लिए शीतयुद्ध चलता रहता था.</p>
<p>दोनों भाइयों की यही ख्वाहिश थी कि उनका पुत्र ही हस्तिनापुर का उतराधिकारी बने लेकिन सिहांसन पर बैठने की यह शर्त इस बात पर निर्भर करती थी कि दोनों राजाओं में से जिसका भी पुत्र पहले होगा वही हस्तिनापुर का  उतराधिकारी बनेगा?</p>
<p>दोनों भाईयों में धृतराष्ट्र बड़े थे और गांधारी से उनका विवाह भी पहले हुआ था, लेकिन विवाह के कई समय बाद तक भी  धृतराष्ट्र और गांधारी की कोई संतान नहीं हुई थी. वही पांडू का विवाह कुंती से होने वाला था जिससे यह बात भी तय थी कि विवाह के बाद उनकी संतान भी होंगी और यदि उनकी संतान धृतराष्ट्र और गांधारी की संतान से पहले हो गयी तो नियमानुसार वही हस्तिनापुर की राजगद्दी में बैठेगी.</p>
<p>एक दिन विवाह होने के इतने समय बाद भी अपनी संतान न होने के दुःख और सिंहासन के हाथ से निकलने के भय से धृतराष्ट्र व्याकुल होकर अपनी एक दासी के साथ ही अवैध संबंध बन बैठे और उस दासी ने एक पुत्र को जन्म दिया. धृतराष्ट्र की वह दासी अवैध संबंध से उत्पन्न होने वाली संतान को जब जन्म देने वाली थी, उसी वक़्त गांधारी भी गर्भवती थी और संतान के रूप में उसने मांस का टुकड़े को जन्म दिया.</p>
<p>संतान के रूप में मांस का टुकड़ा देख कर धृतराष्ट्र के सामने पूरा सच आ गया और धृतराष्ट्र ने भी गांधारी से दासी के साथ बनाये अपने अवैध संबंध की सचाई भी बता दी. कलश में रखे मांस के टुकड़े से सबसे पहले दुर्योधन का जन्म हुआ था. दुर्योधन के बाद दुशासन के जन्म के समय ही धृतराष्ट्र की दासी ने धृतराष्ट्र के एक और पुत्र को जन्म दिया था.</p>
<p>अवैध संबंध के चलते धृतराष्ट्र की दासी से जो पुत्र हुआ, वही बाद भी विकर्ण कहलाया लेकिन एक दासी पुत्र होने के बाद भी विकर्ण को बाकि कौरवों की तरह एक राजकुमार के सभी अधिकार मिले थे पर विकर्ण ही एक मात्र कौरव था, जिसने महाभारत के युद्ध में पांडवों की ओर से युद्ध में हिस्सा लिया था और सभी कौरवो में से विकर्ण ही एक ऐसा कौरव था, जो जीवित बच पाया था.</p>
<p>महाभारत काल में हुए कौरव-पांडव के बीच युद्ध वजह की मुख्य वजह “द्रौपदी चीरहरण” के समय भी विकर्ण ही एक ऐसा कौरव था, जिसने दुर्योधन और दुशासन के कृत्य की निंदा की थी और इस पूरी घटना का विरोध किया था.</p>
<p>अपने सभी भाईयों के साथ अधर्म के रास्ते में न चल कर विकर्ण ने धर्म के रास्तें में चलना तय किया और पांडवों का इस पुरे युद्ध में साथ देना तय किया था.</p>
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    	</item>
		<item>
		<title>क्यों किया गया था &#8216; समुद्र मंथन &#8216;?</title>
		<link>https://www.youngisthan.in/hindi/why-samudra-manthan-happened-12768/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Sagar Shri Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Sep 2015 04:13:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[hindu]]></category>
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					<description><![CDATA[<p><img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/samudra-mandhan-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="samudra-mandhan" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/samudra-mandhan-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/samudra-mandhan-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/samudra-mandhan.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />हिन्दूधर्म की पौराणिक कथाओं में वैसे तो कई कथाएँ प्रचलित हैं&#8230; लेकिन देवता और दानवों द्वारा कियें गया समुद्र मंथन की कहानी सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं. कहा जाता हैं कि मंदार पर्वत को शेषनाग से बांधकर समुद्र का मंथन किया गया था और उस मंथन में समुद्र से ऐसी कई चीज़े प्राप्त हुई थी, जो [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/samudra-mandhan-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="samudra-mandhan" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/samudra-mandhan-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/samudra-mandhan-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/09/samudra-mandhan.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p>हिन्दूधर्म की पौराणिक कथाओं में वैसे तो कई कथाएँ प्रचलित हैं&#8230;</p>
<p>लेकिन देवता और दानवों द्वारा कियें गया समुद्र मंथन की कहानी सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं.</p>
<p>कहा जाता हैं कि मंदार पर्वत को शेषनाग से बांधकर समुद्र का मंथन किया गया था और उस मंथन में समुद्र से ऐसी कई चीज़े प्राप्त हुई थी, जो बहुत अमूल्य थी. मंथन से प्राप्त चीजों में से एक चीज़ अमृत भी थी, जिसे लेकर देवताओं और असुरों में देवासुर युद्ध हुआ था और भगवान विष्णु की मदद से देवता इस युद्ध में अमृत को पाकर विजय प्राप्त कर पाए थे.</p>
<p>लेकिन क्या आप जानते हैं कि समुद्र का मंथन करने की बात देवतों के मन में आई कैसी थी? इस पुरे वाकये के पीछे एक रोचक कहानी हैं जिसे आज हम आपको बतायेंगे.</p>
<p>विष्णु पुराण की एक कथा के अनुसार एक बार देवराज इन्द्र अपनी किसी यात्रा से बैकुंठ लोक वापस लौट रहे थे और उसी समय दुर्वासा ऋषि बैकुंठ लोक से बाहर जा रहे थे. दुर्वासा ऋषि ने ऐरावत हाथी में बैठे इन्द्रदेव को देखा तो उन्हें भ्रम हुआ कि हाथी में बैठा व्यक्ति त्रिलोकपति भगवान् विष्णु हैं. अपने इस भ्रम को सही समझ कर दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र को फूलों की एक माला भेंट की लेकिन अपने मद और वैभव में डूबे देवराज इन्द्र वह माला अपने हाथी ऐरावत के सिर पर फेंक दी और ऐरावत हाथी ने भी अपना सिर झटक कर उस माला को ज़मीन पर गिरा दिया जिससे वह माला ऐरावत के पैरों तले कुचल गयी.</p>
<p>दुर्वासा ऋषि ने जब इन्द्र की इस हरकत को यह देखा तो क्रोधित हो गए. उन्होंने ने इन्द्र द्वारा किये गए इस व्यवहार से खुद का अपमान तो समझा ही साथ ही इसे देवी लक्ष्मी का भी अपमान समझा.</p>
<p>इन्द्र द्वारा किये गए इस अपमान के बाद दुर्वासा ऋषि ने इन्द्र की श्रीहीन होने का श्राप दे डाला. ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के कुछ ही समय बाद इन्द्र का सारा वैभव समुद्र में गिर गया और दैत्यों से युद्ध हारने पर उनका स्वर्ग से अधिकार छीन लिया गया.</p>
<p>अपनी इस दशा से परेशान होकर सभी देवता इंद्रदेव के साथ भगवान् विष्णु के पास पहुचे और इस समस्या का समाधान पूछा. तब भगवान् ने देवताओं को समुद्र मंथन कर स्वर्ग का सम्पूर्ण वैभव वापस पाने और मंथन से निकलने वाले अमृत का उपभोग करने का रास्ता सुझाया.</p>
<p>देवताओं को भगवान् विष्णु द्वारा सुझाया गया यह मार्ग स्वीकार था लेकिन इस समाधान में एक दिक्कत यह थी कि समुद्र मंथन अकेले देवताओं के बस की बात नहीं थी उन्हें इसमें दैत्यों को भी शामिल करना आवश्यक था. देवता नारायण की इस बात के लिए राजी हो गए और उन्होंने दानवो के साथ मिल कर समुद्र मंथन किया.</p>
<p>मान्यता हैं कि समुद्र मंथन से अमृत के अलावा धन्वन्तरी, कल्पवृक्ष, कौस्तुभ मणि, दिव्य शंख, वारुणी या मदिरा, पारिजात वृक्ष, चंद्रमा, अप्सराएं, उचौ:श्राव अश्व, हलाहल या विष और कामधेनु गाय भी प्राप्त हुई थी. लेकिन अमृतपान के लिए देवता और असुरों में युद्ध हुआ था. भगवान् विष्णु की मदद से देवताओं ने यह युद्ध जीत लिया  और अंततः देवताओं को अमृत की प्राप्ति हो पाई थी.</p>
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    	</item>
		<item>
		<title> क्या इन्सान सच में पहले 1000 सालों तक जिन्दा रहते थे?</title>
		<link>https://www.youngisthan.in/hindi/is-it-possible-human-can-live-1000-years-12022/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Sagar Shri Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Aug 2015 06:55:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[dharm]]></category>
		<category><![CDATA[Featured]]></category>
		<category><![CDATA[indian story]]></category>
		<category><![CDATA[mahabharat]]></category>
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		<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[<p><img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/08/lambi-umar-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="lambi-umar" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/08/lambi-umar-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/08/lambi-umar-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/08/lambi-umar.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" />प्राचीन काल में क्या सचमुच इंसानों की उम्र हज़ार साल हुआ करती थी? इस सवाल के जवाब के लिए हमें रामायण और महाभारत के युग में जाना होगा. कहते हैं कि उस काल में कई ऐसे शक्तिशाली व्यक्ति हुए जिन्होंने ने समय और उम्र को मात देकर अपने जीवन को दुसरों के उपकार में लगाया [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="300" height="180" src="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/08/lambi-umar-300x180.jpg" class="attachment-medium size-medium wp-post-image" alt="lambi-umar" decoding="async" style="float:left; margin:0 15px 15px 0;" loading="lazy" srcset="https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/08/lambi-umar-300x180.jpg 300w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/08/lambi-umar-400x240.jpg 400w, https://www.youngisthan.in/hindi/wp-content/uploads/2015/08/lambi-umar.jpg 1000w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /><p>प्राचीन काल में क्या सचमुच इंसानों की उम्र हज़ार साल हुआ करती थी?</p>
<p>इस सवाल के जवाब के लिए हमें रामायण और महाभारत के युग में जाना होगा.</p>
<p>कहते हैं कि उस काल में कई ऐसे शक्तिशाली व्यक्ति हुए जिन्होंने ने समय और उम्र को मात देकर अपने जीवन को दुसरों के उपकार में लगाया और शायद इसी सोच के चलते वह कई साल तक जीवित रहे.</p>
<p>त्रेता युग जिसे राम और रामायण का युग कहा जाता हैं और द्वापरयुग जिसमे महाभारत हुई थी में हजारों वर्ष का अंतर था और इस काल में ऐसे कई बलशाली मनुष्य हुए जो कई वर्षों तक जीवित रहे जिससे इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता हैं कि पुराने पौराणिक काल में मनुष्यों की आयु सचमुच हज़ार साल से भी अधिक हुआ करती थी.</p>
<p>उस काल से जुड़े कुछ ऐसे व्यक्तियों के बारे में हम आपको बतायेंगे जिनके लिए कहते हैं कि इन्सान सच में पहले 1000 सालों तक जिन्दा रहते थे.</p>
<p><strong>1  हनुमानजी-</strong></p>
<p>कहते हैं कि हनुमान जी कई वर्षों तक जीवित रहे थे. क्योकि रामायण काल में तो उन्होंने भगवान् राम और लक्ष्मण की रावण से युद्ध जीतने मदद की थी और माता सीता को मुक्त कराया था. वहीँ हनुमान जी का उल्लेख महभारत के एक और प्रसंग में भी मिलता हैं जहाँ उन्होंने भीम से युद्ध करके उसके अहंकार को नष्ट किया था और सही मार्ग पर चलने की सलाह दी थी. इन दोनों बातो से यह लगता हैं कि हनुमान जी अवश्य ही कई सालों तक जीवित रहे थे.</p>
<p><strong>2  मयासुर-</strong></p>
<p>रामायण में उल्लेख मिलता हैं कि मयासुर रावण की पत्नी मंदोदरी के पिता थे और ज्योतिषी और वास्तु के जानकार थे. वहीँ महाभारत में यह उल्लेख मिलता हैं कि युधिष्टिर के सभा भवन का निर्माण मयासुर ने ही किया था इसलिए उस भवन का नाम मयसभा रखा गया था. कहते हैं कि वह भवन इतना खुबसूरत था कि दुर्योधन इसे देखकर पांडवों से इर्ष्या करने लगा था और महाभारत का युद्ध होने में एक वजह यह इर्ष्या भी थी.</p>
<p><strong>3  जामवंत-</strong></p>
<p>रामायण काल में भगवान राम की सेना में हनुमान, सुग्रीव और अंगद के साथ जामवंत भी थे. यह जामवंत ही थे जिन्होंने समुद्र पार करने में हनुमान जी को उनकी शक्तिया याद दिला कर यह कार्य संभव कराया था. वहीं महाभारत काल में इन्हीं जामवंत का श्रीकृष्ण के साथ एक युद्ध का उल्लेख भी मिलता हैं जिसमे जामवंत पराजित होकर अपनी पुत्री जामवंती का विवाह भगवान् कृष्ण के साथ करा दिया था.</p>
<p><strong>4  परशुराम-</strong></p>
<p>परशुराम अपने क्रोध के जाने जाते थे, लेकिन यह भी कहा जाता हैं कि वह भगवान् विष्णु के अवतार थे और कई साल तक जीवित रहे. रामायण काल में जब सीता स्वयंवर हुआ था और भगवान राम ने शिवधनुष तोड़ा था तब परशुराम बहुत क्रोधित हो गए थे परन्तु जैसे ही उन्हें ज्ञात हुआ की श्रीराम भी भगवान् विष्णु के एक अवतार हैं तब परशुराम शांत हो गए थे. वही महाभारत के काल में उनके होने का उल्लेख ऐसे मिलता हैं कि वह भीष्म, गुरु द्रोण और कर्ण के गुरु थे.</p>
<p>पौराणिक काल से जुड़े इन सभी चरित्रों के बारें कही गयी यह सारी बाते अभी तक कहानी और मान्यताओं में ही मिलती हैं, लेकिन लोग अपनी आस्था के अनुसार इन बातो पर यकीन रखते हैं.</p>
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