संबंध

तेरी सूरत आज भी याद है मुझे!

वो चिलमन से झांकती तेरी सूरत आज भी याद है मुझे…

पतझड़ का मौसम था… बाग़ों में रंग-बिरंगे फूल थे क्यारियों में लगे हुए… लेकिन तेरे बदन की ख़ुश्बू के सामने सब फीके से लग रहे थे…

वो तेरा आहिस्ते से आना… नज़रे झुका कर शर्माना… तेरा मुझे देखर यूं इठलाना आज भी याद है मुझे…

कभी तुम मुझे देखती थीं… कभी मैं तुमको देखता था… आंखों ही आंखों में बातें हो जाती थीं… तुम्हारी एक झलक देखने के बाद मैं ख़ुदा का शुक्रिया अदा करता था और तुम्हें पता न चले इसीलिए आहिस्ते से ख़ुदा से नज़रें चुरा कर फिर तुमको देखने लग जाता था…

कैसे भूलूंगा उन लम्हों को… कहा न तेरी सूरत आज भी याद है मुझे… मैं तुम्हें ख़ुश करने की चाहत में क्या-क्या न करता…

अपने काम भूल गया था मैं…

मेरे आते हुए क़दमों की आहट भी पहचान लेती थीं तुम…

अपने छरहरे बदन की रंगत और काया पर ख़ूब इतराती थीं तुम… मैं तो गुलाब की पंखुड़ियों के जैसे होठों की उस अंजुमन में ही खो जाता था… तेरे चेहरे ने मेरे दिल की गहराईयों पर भी पहरा लगा दिया था… शरारतें क्या होती हैं… मुस्कुराहट क्या होती है… ये सब कुछ सीखा था मैने तुमसे… तेरा बार-बार चेहरे पर आ रहे अपने केशुओं को हटाना आज भी याद है मुझे… फ़क़त बस इतनी है कि उस वक़्त तुम जवां हुआ करती थीं… मैं भी जवां हुआ करता था… बात और है कि अब नाम तुम्हारा पूछे हुए ज़माना हो गया…

मेरे चेहरे पर सिलवटें पड़ गई हैं अब तो… लेकिन तेरे चेहरे का नूर आज भी घायल कर जाता है मुझे…

हां ये बात और है कि तुम्हें अब याद नहीं मेरा चेहरा…

पर मैं नहीं भूला तुम्हें आज तक… कहा न तेरी सूरत आज भी याद है मुझे… उस रोज़ गुज़र रहा था मैं रास्ते से… सामने मेरे तुम आई भी थीं… थोड़ा रुक कर शायद सोच रही थीं तुम कि चेहरा कोई जाना-पहचाना सा ही है, लेकिन कुछ कहा नहीं.. .मैं भी सोच रहा था उस वक़्त कि आज तो कह ही दूं अपने दिल की बात तुमसे, लेकिन हिम्मत न हुई…

तुम जाती रहीं और मैं यूं ही तुम्हें देखता रहा…

कहा न तेरी सूरत आज भी याद है मुझे… मैं आज भी उस बाग़ में रोज़ जाता हूं… तुम्हारा इंतज़ार करता हूं… सोचता हूं कि शायद दिल में तुम्हारे इक बात कौंधे कि लगता है मैं ज़माने के उस दौर में कुछ छोड़ आई हूं और सरपट दौड़ती हुई मेरे पास आ जाओ… मैं भी कितना बेवक़ूफ़ हूं… मुझे पता है कि जवानी के उस जोश को आज की बूढ़ी हड्डियों में ढ़ूंढने की कोशिश कर रहा हूं मैं…

क्या करुं ?

दिल में लगी तुम्हारी चाहत की चिंगारी आज तक बुझने नहीं दी है मैंने…

तेरे होठों के अनछुए अहसास को आज तक ज़िंदा रखा है मैने…

ये पता नहीं कि तुम्हें अब कुछ याद भी है या नहीं, लेकिन मैं ज़िंदगी के उन ख़ुशगवार लम्हों को भूलूं भी तो कैसे ? भूला ही नहीं जाता…कहा न तेरी सूरत आज भी याद है मुझे…

60 साल गुज़र गए…

कई बसंत भी देखे, लेकिन वो पतझड़ का मौसम दोबारा नहीं लौटा…

हां ये ज़रुर है कि अब मेरी ज़िंदगी में पतझड़ के मौसम आ गए हैं… चेहरे पर पड़ी झुर्रियों का साथ लिए आज ख़ुद को ख़ुद में ढूंढने की ज़द्दोज़हद में लगा हूं, लेकिन तुम्हें ढूंढने में आज भी मुझे वक़्त नहीं लगता… मेरे घर की चार गली के बाद ही तेरा घर पड़ता है… जो मालूम है मुझे… गुज़रता तो हूं उस गली से… तेरे घर की चौखट के सामने से, लेकिन हिम्मत नहीं होती कि अपने क़दमों को तेरे घर की तरफ़ मोड़ दूं… तड़पता ज़रुर है दिल मेरा आज भी उतना ही, लेकिन क्या करुं कम्बख़्त अब तुम्हारी आंखों पर पड़े आईने भी मुझे पहचान नहीं पाते…

तुम्हारे चेहरे की रंगत आज भी जवां-जवां सी है…

कहा न….. तेरी सूरत आज भी याद है मुझे…

Arbind Verma

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Arbind Verma

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