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मुंबई में एक बैचलर की कहानी! ऐसी होती है ज़िन्दगी!

मुंबई सपनों का शहर है और पूरे देश से यहाँ लड़के-लड़कियाँ आते हैं अपनी ज़िन्दगी बनाने, सपने पूरे करने!

पूरी आज़ादी है यहाँ अपनी मर्ज़ी की ज़िन्दगी जीने की लेकिन अगर आप बैचलर हैं तो फिर कहानी में ज़रा ट्विस्ट आ जाता है!

आईये बताऊँ क्या-क्या होता है मुंबई में एक बैचलर यहाँ:

1) सबसे पहले तो घर ही किराए पर नहीं मिलता! हाउसिंग सोसाइटीज़ की शर्त आने लगी है अब कि बैचलर्स को घर नहीं देना, माँ-बाप साथ में हों तो ही घर मिलेगा वरना टाटा-बायबाय! पता नहीं बेचारे बैचलर्स हैं या आतंकवादी?

2) चलो कुछ जुगाड़ करके, हाथ-पाँव जोड़कर घर मिल गया तो दिक्कत आती है कामवाली की! उनके भाव बढ़ जाते हैं कि बैचलर हो, घर गन्दा रखोगे, मेरा काम बढ़ जाएगा तो पैसे भी मैं ज़्यादा लूंगी! बेचारे बैचलर के पास कोई चारा नहीं होता क्योंकि बिना कामवाली के मुंबई में एक क़दम भी चलना नामुमकिन है!

3) अगर अकेले लिया है घर किराए पर तो अड़ोसी-पड़ोसियों की मदद लो चिट्ठी-कूरियर लेने के लिए जो आपके पीछे से इतना ध्यान तो रख सकें! और अगर घर में प्लंबिंग या बिजली का काम करवाना है तो इंतज़ार करो कि कब छुट्टी होगी ऑफ़िस की और यह काम हो पाएँगे!

4) अगर घर कुछ दोस्तों के साथ लिया है या किसी के फ़्लैट में शिफ़्ट हुए हैं तो झेलना पड़ेगा गंदे घर का नज़ारा, गंदे टॉयलेट्स और कपड़ों की चोरी का ज़ुल्म! अब हर कोई तो आपकी तरह साफ़-सुथरा रहेगा नहीं! और सब आपको दोस्त समझ के बिंदास आपके कपड़े भी इस्तेमाल करेंगे और कहा सिर्फ़ ये जाएगा कि यार दोस्त किसलिए होते हैं?

5) घर में सेटल होना आसान है, समाज में यानि कि बिल्डिंग की सोसाइटी में उतना ही मुश्किल! घर से निकलते ही लोग आपको ऐसी तुच्छ नज़रों से देखेंगे जैसे आप कोई पाप करके आ रहे हो! आप उन से नज़रें मिलायेंगे और पढ़ लेंगे उनके विचार: यह बैचलर पक्का रात को शराब पीकर आता है, जाने कितनी लड़कियों को फ़्लैट में लाता है, इसे तो यहाँ से निकालना ही पड़ेगा! पसीना-पसीना हो जाते हैं ऐसे विचार पढ़के और सोचना पड़ता है कि कैसे बताएँ कि नौकरी से साँस लेने कि फ़ुर्सत नहीं है, अय्याशी कहाँ से होगी?

6) ऑफ़िस पहुंचोगे तो बॉस सोचेगा यार ये तो बैचलर है, कोई ज़िम्मेदारी है नहीं तो सारे काम करवा लो! मतलब दिन जल्दी शुरू होगा और ख़त्म आधी रात के बाद! आधे ऑफ़िस का काम आपसे ही करवाया जाएगा और कहा जाएगा सीखने की उम्र है, सीख लो!

7) ये सब होने के बाद छुट्टी के दिन जब टाँग पर टाँग डाल के बैठोगे और सोचोगे ना तो एहसास होगा कि जैसी भी है, मुंबई में ज़िन्दगी कमाल की है! कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ आने-जाने की आज़ादी, अपनी ज़िन्दगी, अपनी शर्तों पर जीने का मज़ा और जितनी मेहनत, उतने अच्छे नतीजे मिलने की गारंटी! बाकी दिक्कतें और मुश्किलें तो हर शहर में हर जगह आती हैं, चाहे अपने घरवालों के साथ ही क्यों ना रह रहे हो, क्यों?

सौ बात की एक बात: मुंबई में बैचलर की ज़िन्दगी एडवेंचर से भरी है और जिसे ज़िन्दगी जीनी आती है, उसके लिए भरपूर मज़े लूटने के हज़ारों रास्ते हैं!

Nitish Bakshi

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Nitish Bakshi

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