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देश में भिखारियों की बढ़ती समस्या की जड़ में है पूंजीवाद !

भिखारियों की बढ़ती समस्या – भारत एक ओर जहां दुनिया के विकसित देशों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा तो दूसरी ओर देश में भिखारियों की बढ़ती तादाद आज एक अहम समस्या बनी हुई हैं.

हालांकि सांस्कृतिक देश भारत में यह कोई नई बात नहीं है.

इतिहास के पन्नों को उलटकर देखें तो पता चलेगा कि पहले भी हमारे देश में भिक्षावृत्ति होती थी.

लेकिन वर्तमान में इसका जो स्वरूप है वह बिल्कुल ही अलग है. पहले सांसारिक मोह-माया त्यागकर ज्ञान प्राप्ति के लिए निकले महापुरुष भिक्षा मांगकर अपना जीवन-यापन करते थे. लेकिन आज भिखारियों को एक बड़ा वर्ग दैनिक जरूरत पूरा करने और जिंदगी जीने के लिए भिक्षा मांग रहा है.

समाज में भिखारियों की संख्या बढना कोई अचरज की बात नहीं, ना ही इसका कोई अनोखा कारण है. दरअसल, देश का जनतांत्रिक सिस्टम शायद इनके बढ़ावे को प्रेरित करता है. देश की पूंजीवाद नीति के चलते गरीब तबका पीछे रह गया, लिहाजा जीवन-यापन के लिए कोई साधन न मिलने पर भीख मांगना शुरू कर दिया.

एक सर्वेक्षण के अनुसार सन् 1991 के बाद भिखारियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली. यही भिखारियों की बढ़ती समस्या का वह दौर है जब भारत ही नहीं पूरी दुनिया मे आर्थिक उदारीकरण के नाम पर पूंजीवाद को थोपा गया था.

इसने जहां पैसे वालों को अधिक से अधिक पूंजी कमाने के लिए प्रेरित किया वहीं गरीब के मन में लालच पैदा किया.

जिसके पास पहले से पैसा था उसे तो ऐशों आराम के सामान जुटाने में कोई कठिनाई नहीं हुई लेकिन गरीब के पास इस व्यवस्था में बने रहने के लिए ज्यादा स्पेस नहीं था.

क्योंकि उसके पास न तो पूंजी थी और न ही तकनीकी दक्षता जो कि पूंजीवादी व्यवस्था की पहली शर्त होती है.

देश विकास की राह में बढ़ा, इसके साथ ही बाजारवाद को बढ़ावा मिला, लेकिन साथ ही बढ़ी भिखारियों की संख्या. हालांकि इसे रोकने के लिए काफी कोशिशें की गईं लेकिन यह महज जीवन-यापन का जरिया नहीं बल्कि एक नए कारोबार के रूप में समाज के सामने सीना तानकर खड़ा हो गया.

यही कारण है कि आप को बड़े शहरों में ऐसे भिखारी मिलेगे जो कि गांव से रोजगार की तलाश में आने के बाद भिक्षावृति के धंधें मे आ गए.

क्योंकि उनके पास नई व्यवस्था में टिके रहने के लिए न तो शिक्षा थी और न ही तकनीकि दक्षता. इस कारण भिक्षा के कार्य में लोगों की संख्या के बढ़ने के पीछे एक बड़ा कारण ये भी है.

एक अनुमान के तहत दिल्ली में सवा लाख के करीब भिखारी है. यदि इनकी आय पर गौर किया जाए तो इनका अनुमानित कारोबार सालाना तकरीबन 215 करोड़ रुपये का है. ये तो हुए दिल्ली के आंकड़े, तो पूरे भारत में इस उद्योग का सालाना कारोबार खुद ही आप अनुमान लगा सकते हैं.

भारत जैसे विकासशील देश में रोजगार के पर्याप्त साधन न होने के चलते इस पेशे को बढ़ावा मिलता है. क्योंकि विकास के बदलाव के दौर में सबसे अधिक मार अशिक्षित और अकुश लोगों पर ही पड़ रही है.

ये है भिखारियों की बढ़ती समस्या का जड़. शायद यही वजह है कि कभी-कभी ऐसे लोग भी दिख जाते हैं जो शिक्षित तो हैं पर उनके पास रोजगार नहीं है, थक-हार कर वो इस पेशें से जुडने में तनिक भी संकोच नहीं करते.

Vivek Tyagi

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